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दुनिया का सबसे बड़ा खुला शौचालय

          कहा जाता है की सच्ची बात हमेशा कडवी होती है | लेकिन कडवी चीज़ों के भी अपने बहुत सारे फायदे होते है | अभी हाल ही में ऐसा ही एक कडवा बयान केंद्रीय ग्रामीण मंत्री जय राम रमेश ने दिया जिसे सुनकर भद्र जानो और बुद्धिजीवी बर्ग की नाक भौं सिकुड़ सकती है, पर सच्चाई तो सच्चाई है | हम इससे दूर नहीं भाग सकते और न ही इसे झुटला सकते हैं |
           केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने देश की जीवनरेखा मानी जाने वाली रेलवे को दुनिया का सबसे बड़ा शौचालय करार दिया है। रमेश ने कहा कि हम खुले में शौच करने के मामले में दुनिया में नंबर एक पर हैं। दुनिया में खुले में होने वाले शौच का 60 फीसदी भारत में होता है। यह बड़े ही शर्म की बात है। उनका कहना है की भारत में स्वच्छता की समस्याओं का दूसरा रूप रेलवे है, जो दुनिया का सबसे बड़ा खुला शौचालय है। उन्होंने कहा कि 11 लाख यात्री प्रतिदिन खुले में शौचालय करते हैं। रेलवे में सफाई की क्या दशा है इसके बारे में हम सभी जानते हैं।
            ग्रामीण मंत्री का यह बयान बहस का मुद्दा हो सकता है लेकिन यह सच है की आज रेल में जो शौचालय की व्यवस्था है वह खुले में शौच करने जैसा ही है | रेल में यात्रा करने वाले लाखों यात्री हर रोज़ बंद डिब्बे में बैठकर खुले में शौच करते है | इससे पटरियों पर तो गंदगी फैलती ही है स्टेशन पर भी भीषण गंदगी बिजबिजाती रहती है |  मौजूदा समय में नौ रेलगाडियों के 436 डिब्बों में ही जैव-शौचालयों को लगाया गया है। यह संख्या दुनिया के इस दुसरे सबसे बड़े रेल नेटवर्क में नाकाफी है | हम चाहे अपनी तरक्की के कितने ही गीत गा लें, चाहे कितना भी अपने मियां मिट्ठू बन लें लेकिन सच्चाई हमें आज भी मुंह चिड़ा रही है |
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हरजाई पीली पत्ती

आज कल मुझे  एक नयी मुसीबत से दो चार होना पड़ रहा है | मेरी परेशानी की वजह है पीली  पत्ती | मै आपको बता दूं कि पत्तियां कई रंग की होती हैं ये रंग हैं हरी, पीली और लाल | हमारी जिंदगी में तीनो तरह की पत्तियों की अहम जगह होती है | इनमे से सबसे ऊपर है लाल, उससे नीचे पीला और उसके नीचे हरी |  ये  जो लाल पत्ती होती है इसके रखने वाले इस समाज के सबसे रसूखदार लोग होते हैं और पीली पत्ती के मालिक उनसे थोडा नीचे आते हैं वहीँ सबसे नीचे आते हैं नीली पत्ती के मालिक | मै अभी तक सबसे नीचे पायदान पर हूँ | आज कल नीचे पायदान पर रहने वालों की कोई पूछ नहीं होती, यही हाल मेरा भी है | सबसे निचले पायदान पर रहने वालों के साथ एक परेशानी और जुडी रहती है कि अगर गलती से अनजाने में उनके पास पीली पत्ती आ जाये तो समझो आ गयी मुसीबत | अब तो यह मुसीबत आये दिन मेरा पीछा करती ही रहती है | भला हो इन हरजाई एटीएम का जो आये दिन पीली पत्ती ही निकल कर देता है | न चाहते हुए भी यह मुझसे चिपक जाती है | पीली पत्ती मिलने के बाद शुरू होती है असली मुसीबत | पहली मुसीबत इस पीली पत्ती को नीली पत्तियों में बदलबाने के लिए दर दर भटकना पड़ता है | दूसरी दूकान से कुछ अनचाहा सामान खरीदना पड़ता है |
जब इस पीली पत्ती को लेकर दूकान पर जाता हूँ तो पहले तो दूकानदार मुझे शक की निगाहों से देखते हुए घूरता है और फिर मेरी पीली पत्ती को, उसके बाद ऊपर से नीचे एक सरसरी निगाह मेरे ऊपर डालकर ऐसे देखता है जैसे मै कोई चोर हूँ या इतना तुच्छ इंसान जिसे उसकी हैसियत से उलट मुझे यह पत्ती मिल गयी हो और फिर मेरी पत्ती को देखता है | दुकानदार की कातिलाना निगाहों से मै ऐसे डर जाता हूँ जैसे चोर पुलिस से | फिर वो पत्ती को टियूब लाइट की रोशनी में पत्ती को गौर से निहारता कर कहता है “कम से कम पचास रुपये का सामान खरीदना पड़ेगा” | मै बेचारा पत्ती का मारा न चाहते हुए सामान खरीदना पड़ता है और सामान लेकर चल पड़ता हूँ अपनी मंजिल की ओर |

 

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आहा ! जिंदगी…

    कितनी भागम भाग है इस जिंदगी में, कभी फुर्सत ही नहीं  मिलती कुछ न कुछ लगा हि रहता है | हम हमेशा एक किस्म की बेचैनी में घिरे रहते हैं और सोचते हैं की काश हमें भी चैन होता, हमें भी सुकून की जिंदगी मिली होती ! मनोविज्ञानियों का मानना हैकि चैन की जिंदगी इन्सान को ख़त्म कर देती है, यह उबाऊ होती है | वहीँ बेचैनी की जिंदगी जोशीली होती है, हर दम नई सीख देती हुई नए तजुर्बों से लबालब भरी हुई |
जब हम वक़्त के आईने में देखते हैं तो सुख और चैन हमें अपील करता है | लेकिन जब हम जिंदगी के लम्बे वक़्त में देखते है तो परेशानी होती है की हमने कोई जोखिम क्यूँ नहीं उठाया ..? अगर हम जोखिम उठा लेते तो यह जिंदगी यहीं पर अटकी न रह जाती, यह ज़िन्दगी कुछ और होती | कभी कभी हम महसूस करते हैं कि जिंदगी ठहरी हुई है, उसमे कुछ भी नया नहीं हो रहा है | लेकिन हम जो हैं उसे छोड़ने को तैयार नहीं होते हैं | आखिर कुछ तो है…! हम इसमें अटके रह जाते है | हम चाहते ज़रूर है कि हमारी जिंदगी में कुछ बदलाव हो जाये | लेकिन इस बदलाव के लिए हम ज़हमत उठाने के लिए तैयार नहीं होते | कुल मिलाकर हम परेशान रहते हैं, पर कहीं न कहीं हम खुश भी रहते हैं कि चलो कुछ तो है न | अब चाहे जैसी जिंदगी हो हम उसमे चैन और सुकून ढूंड लेते है | हम बदलना तो चाहते हैं बशर्ते हमारे आराम और चैन-ओ-सुकून में खलल न पड़े |
ऐसी जिंदगी एक मायने में चैन, आराम की जिंदगी है और ज़ाहिर है यह खासी उबाऊ भी है | दूसरी हम अपनी जिंदगी को लेकर परेशान है | उससे निकलने को लेकर छटपटा रहे हैं और छटपटाहट में हाथ पैर भी मार रहे है | यह जिंदगी अनिश्चित ज़रूर है, आराम, चैन, सुकून भी इसमें नहीं है जोश से भरी हुयी है | यह हर दिन हमें कुछ नए तजुर्बात देती है | आखिर जिंदगी में बदलाव तो चैन-ओ-सुकून से नहीं होता न |
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जनतंत्र का मतलब

जनतंत्र का मतलब यह है कि सरकार जनता की, जनता के द्वारा और जनता के लिये बनाई गई है.  लेकिन पूर्ण जनतंत्र तभी स्थापित हो सकता है जब किसी भी जनतंत्र के सारे  नियमकानून उस देश की जनता के द्वारा और जनता के लिये बनाये गये हों |

विडंबना यह है कि १९४७ में तकनीकी तौर पर हम आजाद हो गये, लेकिन आज भी अंग्रेजों के द्वारा हिन्दुस्तानियों के दमन एवं शोषण के लिये बनाये गये कई कानून इस देश में चल रहे हैं. फल यह है कि आजाद होते हुए भी, कानून हमारी आजादी की सुरक्षा नहीं कर पा रहा है. न ही हम अपनी आजादी की मांग कर पा रहे हैं क्योंकि कई क्षेत्रों में वही अंग्रेजों के बनाये नियमकानूनों के आधार पर काम चलता है.  इसका एक अच्छा उदाहरण है हमारा पुरातत्व विभाग. इसकी स्थापना अंग्रेजों ने की थी, एवं पिछली एक शताब्दी से अधिक समय में सारे हिन्दुस्तान भर में हो पुरातत्व संग्रहालय हैं उन के पास लाखों वस्तुओं का संग्रह हो गया है |

मेरी रुचि प्राचीन भारत के सिक्कों में है, और पुरातत्व विभाग के पास लाखों दुर्लभ सिक्के पडे हैं. कुछ को जनता देख सकती है लेकिन अधिकांश उनकी कालकोठरियों में पडे है. जो दिखाने के लिये रखे है आप उनका छायाचित्र नहीं उतार सकते. कुल मिलाकर कहा जाये तो हमारे पैसे का उपयोग कर हमारे ही देश की संपत्ति की सुरक्षा में लगे लोग हम को उस असीमित जानकारी का उपयोग करने नहीं देते. न ही वे लोग इस जानकारी को सही रीति से लोगों तक पहुंचा पा रहे हैं |

लगभग हर जनतंत्र में जनता की संपत्ति बडे आराम से जनता को उपलब्ध है. बस अपने ही देश में आप के पैसे से आप को अभी भी गुलाम रखा जा रह है. इसके विरुद्ध जनमत तैयार करना जरूरी है, और इस आलेख को इसकी पहली कडी मान लीजिये |

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खेत, खलिहान और किसान

किसान के ज्ञान को न तो गंभीरता से लिया जा रहा है और न ही उसमे अनुसन्धान की प्रवित्ति जोड़ी जा रही है | देसी ज्ञान को तबज्जो न मिलने की वजह से किसान भुखमरी और अकाल के कगार पर खड़ा है | जबकि हमारे पूर्वजों में ज्ञान से विचार, विचार से जुगाड़ और जुगाड़ से अबिष्कार का प्रचालन रहा है | आज हर किसान के पास कोई न कोई नुस्खा ज़रूर है लेकिन उसके उस्खे पर रिसर्च की ताक़त उसके पास नहीं है | यही किसानों की बर्बादी की असली वजह है |
हमारे पूर्वजों ने पर्यावरण, जल संरक्षण और वन संरक्षण में भी विशेष योग्यता हासिल की है | अनेक उपायों से वे इनकी हिफाज़त करते थे | जंगलों में रहने वाले आदिवासी प्रसव के दौरान एक विशेष पेड़ की छाल का प्रयोग करते थे | छाल निकलने से पहले उस पेड़ को दाल, चावल का न्योता देते फिर उसकी पूजा करते, बाद में मंत्र पढने के साथ ही कुल्हाड़ी के एक बार में जितनी चाल निकल जाये उतने का ही दावा के तौर पर इस्तेमाल करते | लेकिन आज सरकारों का उद्देश्य जंगल की हिफाज़त करना नहीं बल्कि उसे बेचना है |
खेती से जुड़े फैसले भी एसी कमरों में बैठे लोग करते हैं जिनका खेती किसानी से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं होता | अगर यही योजनायें किसानो के बीच बरगद के पढ़ के नीचे बैठकर बनाई जाएँ जिसमे पारंपरिक कृषि और स्थनीय तकनीक के साथ ही ग्रामीण स्तर पर चारा पैदा करने और मवेशियों की स्थानीय नस्लें पैदा करने की सार्थक विचार विमर्श कर ठोस पहल की की जाये तो किसान और मजदूर आत्महत्या करने पर मजबूर नहीं होंगे |

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गेहूं की जगह आटा

कुछ दिन पहले खबर आई की अब उत्तर प्रदेश में अब सरकारी गल्ले की दुकानों से गेहूं की जगह आटा मिलेगा | अगर सब कुछ ठीक रहा तो आने वाले दिनों में लखनऊ के किसी ब्लॉक से इसकी शुरुआत हो सकती है और जल्द ही इसे पुरे प्रदेश में लागू कर दिया जायेगा |
अब सरकारी तंत्र को कौन समझाए कि भैया आटा गेहूं की अपेक्षा जल्दी ख़राब हो जाता है | इसके रखरखाव पर भी ज्यादा खर्च होगा और ज्यादा ध्यान भी देना होगा | बरना इसे फेंकने के अलावा को चारा नहीं होगा | सब कुछ ठेक थक कर देने में माहिर अधिकारीयों के हाथ पांव ही फूल जायेंगे | आखिर गेहूं को कहीं न कहीं सेट कर देते थे अब इस कमबख्त आटा की सेटिंग कहाँ करेंगे ..! जब गेहूं चावल रखने के लिए पर्याप्त मात्र में गोदाम नहीं है और हर साल खुले रहने के कारण लखीं तन गेहूं सड़ जाता है तो आटे का भविष्य क्या होगा …?
अपना राग अलाप रहे अधिकारी कहते हैं कि सरकारी अनाज का डायवर्जन रुकेगा | सरकारी गेहूं के आये दिन आये दिन अनाज माफियाओं द्वारा बेचने की घटनाओं पर अंकुश लगेगा क्यूंकि आटे का डायवर्जन मुश्किल है | अब यह सवाल उठता है कि डायवर्जन तो गेहूं के साथ चावल का भी होता है तब खाली गेहूं का बिकल्प तलाशने की क्या ज़रुरत आन पड़ी..? आखिर बेचारे चावल का क्या होगा…? उसके साथ इतनी नाइंसाफी क्यूँ …? बहरहाल चावल का कुछ हो या ना हो और आटे का चाहे जो भविष्य हो लेकिन रेस्टोरेंट और ढावों पर तीन की रोटी दो में ज़रूर मिलने लगेगी |

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युवाओं के देश में उपेक्षित बुजर्ग

  देश में बेहतर होती चिकित्सीय सेवाओं, खाद्दान की उप्लभदताऔर आर्थिक सम्पन्नता ने जीवन की अवधि को बड़ा दिया है | दर असल बीते दशकों में देश की जन्सान्ख्कीय संरचना में काफी परिवर्तन आया है | नवीनतम देशों में बुजुर्गों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है और इसी के साथ ही अपने फर्ज्ज़ से दूर भागती संतानों की संख्या भी तीजे से बढ़ रही है | २०११ की जनगणना के आंकड़े भी यही इशारा करते हैं की २०२६ तक देश में बुजुर्गों की संख्या लगभग सत्रह करोड़ से भी अधिक हो जाएगी |
बढ़ती संख्या, बदलता सामाजिक परिवेश और बदलती पारिवारिक संरचना बुजुर्गों की जिंदगी की कठिन बना रहे हैं | गाँव के मुकाबले शहरों में यह समस्या ज्यादा गंभीर होती जा रही है | शहरों में आधे से अधिक बुज़ुर्ग पूरी तरह से दूसरों से निर्भर हैं | सफलता की आधुनिक परिभाषा ने नैतिक, सैधांतिक और वैचारिक अवधारनाओं को ख़त्म कर दिया है | बुजुर्गों के तजुर्बे ख़ारिज किये जा रहे हैं और बुजुर्गों को लगातार हाशिये पर धकेला जा रहा है | बच्चों ने माता पिता ने अलग अलग बांटकर जिम्मेदरियाँ बाँट ली हैं | वे बारी बारी से इनकी देखभाल करते है, कुछ बोलने पर बुजुर्गों को कडवी बातें सुननी पड़ती हैं | ज़िन्दगी की सांझ की बेला में जब शरीर जबाव देने लगता है तब सहारे की ज़रुरत पड़ती है | कई बार बुजुर्गों को परिवार की अनदेखी का सामना करना पड़ता है | इन्हें ओल्ड एज होम में रहने को मजबूर किया जाता है | यह अकेलापण कई बार मानसिक अवसाद का कारण बन जाता है |
उपभोगतावादी संस्कृति की चकाचौंध में अपने माँ बाप की अनदेखी करने वालो को यह नहीं भूलना चाहिए कि कल वे भी बूढ़े होंगे और किसी की सहारे की ज़रुरत होगी |