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लोकतंत्र का मेला

मारे देश में चुनाव लोकतंत्र के वो मेले हैं जो साल के ३६५ दिन देश में कहीं न कहीं लगे ही रहते हैं | जब यह मेले लगते हैं तो चारों तरफ रौनक ही रौनक होती है  | बहुत सारे भूखे लोगों के खाने का इंतजाम हो जाता है | बहुत सारे बेरोजगारों को काम मिल जाता है और तो और निठल्ले और निकम्मे लोग भी इतने मसरूफ हो जाते हैं कि उनसे मिलने के लिए अपॉनइन्मेंट लेना पड़ता है | चौराहे गुलज़ार हो जाते हैं | चाय की दुकानों में रौनक बढ़ जाती है | सटोरियों की भी चांदी हो जाती  है |
चुनाव के ये मेले जब लगते हैं तो एक तरह से सावन का महीना आ जाता है | चारों ओर हरियाली ही हरियाली | हर तरफ चहल पहल | चुनाव के समय ईद का चाँद भी निकलता है, बैसे तो ईद का चाँद हर साल निकलता लेकिन यह चाँद पांच साल के बाद निकलता है और कभी-कभी किस्मत से मध्यावधि में भी नमूदार हो जाता है | चुनाव के इस मौसम में उल्लू भी रात में शिकार पर निकलते हैं, जो अपने शिकार के घर की कुण्डियाँ खट खटाकर परेशान करते रहते हैं | वहीँ कुछ झींगुर और मेंढक जैसे छोटे और निम्न जीव जंतु भी नारे लगते हुए सारी रात सोये हुए लोगों की नींद में खलल डालते रहते हैं |
इन मेलों में वादों की मूसलाधार बारिश भी होती है | इस बरसात में बरसों से प्यासे भूखे, नंगे, ग़रीब और उम्मीदों की एक बूँद को तरस रहे आम आदमी खूब तर बतर होते हैं | यहाँ सभाओं में उम्मीदों और सुहाने सपनों की भी खूब रेवड़ियाँ बांटी जाती हैं | ख्वाबों को ऐसे पंख लगाये जाते हैं कि कल तक ज़मीन में रेंगने वाले लोग आसमान में लम्बी परवाज़ पर निकल जाते हैं |
लोगों की उम्मीदों को हकीकत की ज़मीन तब मिलती है जब जब मेला उजाड़ जाता है, ईद का चाँद छुप जाता है |  मेले के उजड़ने के साथ ही सपने बिखर जाते हैं, उमीदें चकनाचूर हो जाती हैं, निठल्ले और निकम्मे लोग फिर अपने पुराने काम पर लौट जाते हैं | चाय की दुकानों पर चर्चाओं का बाज़ार ख़त्म हो जाता है, चौराहों की रौनक ख़त्म हो जाती है, सपनो के पर क़तर जाते हैं, उम्मीदों की परवाज़ थम जाती है, उल्लू अपना शिकार करके लौट जाता है, निम्न जीव जंतुओं के नारे बंद हो जाते हैं | आम आदमी अब आराम से सोयेगा अगले मेले के आने तक……..|

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3 विचार “लोकतंत्र का मेला&rdquo पर;

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