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युवाओं के देश में उपेक्षित बुजर्ग

  देश में बेहतर होती चिकित्सीय सेवाओं, खाद्दान की उप्लभदताऔर आर्थिक सम्पन्नता ने जीवन की अवधि को बड़ा दिया है | दर असल बीते दशकों में देश की जन्सान्ख्कीय संरचना में काफी परिवर्तन आया है | नवीनतम देशों में बुजुर्गों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है और इसी के साथ ही अपने फर्ज्ज़ से दूर भागती संतानों की संख्या भी तीजे से बढ़ रही है | २०११ की जनगणना के आंकड़े भी यही इशारा करते हैं की २०२६ तक देश में बुजुर्गों की संख्या लगभग सत्रह करोड़ से भी अधिक हो जाएगी |
बढ़ती संख्या, बदलता सामाजिक परिवेश और बदलती पारिवारिक संरचना बुजुर्गों की जिंदगी की कठिन बना रहे हैं | गाँव के मुकाबले शहरों में यह समस्या ज्यादा गंभीर होती जा रही है | शहरों में आधे से अधिक बुज़ुर्ग पूरी तरह से दूसरों से निर्भर हैं | सफलता की आधुनिक परिभाषा ने नैतिक, सैधांतिक और वैचारिक अवधारनाओं को ख़त्म कर दिया है | बुजुर्गों के तजुर्बे ख़ारिज किये जा रहे हैं और बुजुर्गों को लगातार हाशिये पर धकेला जा रहा है | बच्चों ने माता पिता ने अलग अलग बांटकर जिम्मेदरियाँ बाँट ली हैं | वे बारी बारी से इनकी देखभाल करते है, कुछ बोलने पर बुजुर्गों को कडवी बातें सुननी पड़ती हैं | ज़िन्दगी की सांझ की बेला में जब शरीर जबाव देने लगता है तब सहारे की ज़रुरत पड़ती है | कई बार बुजुर्गों को परिवार की अनदेखी का सामना करना पड़ता है | इन्हें ओल्ड एज होम में रहने को मजबूर किया जाता है | यह अकेलापण कई बार मानसिक अवसाद का कारण बन जाता है |
उपभोगतावादी संस्कृति की चकाचौंध में अपने माँ बाप की अनदेखी करने वालो को यह नहीं भूलना चाहिए कि कल वे भी बूढ़े होंगे और किसी की सहारे की ज़रुरत होगी |

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4 विचार “युवाओं के देश में उपेक्षित बुजर्ग&rdquo पर;

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